Manifesto For Economic Democracy and Ecological Sanity (Hindi Language)
आर्थिक जनतन्त्र और परिवेश-स्वच्छता का इश्तहार
बदलते हुए समय में इतिहास का एक नया स्वरूप हमारे सामने उपस्थित हो रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था पुरी दुनियाँ में आर्थिक संकट उत्पन्न करती हुई एक ऐसे राजनीतिक घराने को पैदा करना चाह रही है जिसका पालन-पोषण करती है स्वयं पूंजी ही। यह संकट और यह घराना दोनों ही किसी सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए नहीं है। यदि ध्यान से देखा जाये तो एक स्थायी और अच्छी नौकरी तथा प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध बनाकर हम जीवित रहते हैं – इससे अधिक हमारा समाज ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा है जो मानव सभ्यता के लिए लाभजनक है या मानव जाति जिसकी हकदार है। जैसा जीवन हम चाहते हैं, उससे हम वंचित हैं और हमारी अगली पीढ़ी के भविष्य पर सकंट के घने बादल मंडरा रहे हैं – और यह सब हो रहा है कुछ ऐसी सामाजिक परिस्थितियों के कारण जिसे बदला जा सकता है और जो बदला जाना चाहिए। आज की इस असहनीय परिस्थिति का एक प्रधान कारण है हमारी अर्थनीति तथा राजनीति में सच्चे जनतान्त्रिक मूल्यों का अभाव। इसलिए इसके समाधान का रास्ता भी है एक सही आर्थिक जनतान्त्रिक संस्था जो सही अर्थों में राजनीतिक जनतान्त्रिक व्यवस्था का आधार बन सके। अत: कुल मिलाकर हमारे समाज के कार्य क्षेत्र में ही बदलाव की आवश्यकता है, जिसकी एक सम्भावित रुप-रेखा हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
अकुपाई-वॅल-स्ट्रीट (ओडब्लुएस) या वॅल–स्ट्रीट-दखल आन्दोलन ने हमें प्रेरित किया है, जो अब पूरे अमेरिका, और उसके बाहर भी फैल चुका है। ओडब्लुएस सिर्फ हमारी समाजिक व्यवस्था में निहित समाजिक अन्याय और गैर जनतान्त्रिक रवैये के प्रति आम आदमी के आक्रोश को ही व्यक्त नहीं कर रहा है बल्कि इस आन्दोलन का प्रधान लक्ष्य ही है आर्थिक जनतन्त्र की स्थापना। ओडब्लुएस के माध्यम से हम आह्वान कर रहे हैं, समर्थन कर रहे हैं, और एक ऐसा वृहत्तर आन्दोलन छेड़ने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी हमें बेहद आवश्यकता है, समाज को बदलने के लिए ताकि हमारी विभिन्न संस्थाओं में जनतन्त्र के साथ-साथ परिवेश (पर्यावरण) स्वच्छता भी कायम हो सके।
पूंजीवाद और ‘माल निकासी’
पूंजीवादी व्यवस्था यानी मनुष्य, परिवेश, राजनीति एवं संस्कृति सभी का समान रुप से दोहन-शोषण। जिसके फलस्वरूप दुनियाँ भर के देशों में धनी और गरीब के बीच की दूरी के नये-अनदेखे-अनजाने प्रतिमान स्थापित हो रहे हैं, अपनी सर्वोच्य सीमा में ये प्रतिमान हमेशा जनतान्त्रिक आन्दोलनों को क्षति पहुँचाते हैं और कई बार तो नामो निशान तक मिटा देते हैं। पूंजीवादी उत्पादन का लक्ष्य है मुनाफा, यह मुनाफाखोर उत्पादन हमारे लिए लगातार सकंट पैदा करता है – पृथ्वी की तापमात्रा वृद्धि, प्रदूषण तथा प्राकृतिक उर्जा सकंट की तलवार भी सिर पर लटकती रहती है। अभी पूंजीवादी अस्थिरता की वजह से यह व्यवस्था (जिसे लोग बिजनेस साइकिल या व्यपारिक चक्र भी कहते हैं) मुंह के बल गिर पड़ी है, पिछले 75 वर्षों के इतिहास में दूसरी बार सबसे बड़े आर्थिक मन्दी के झटके ने उसकी कमर तोड़ दी है।
‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’1 अमेरिका की दोनो प्रकार की सरकारें अपने अधिकांश नागरिकों को इस मंदी की चपेट से बचा नहीं पाई। हम लगातार देख रहे हैं तीव्र बेकारी की मार, ऋण न चुका पाने की वजह से गिरवी रखे घरों का निलाम होना, रोजगार की अनिश्चयता, सरकारी सहायता में कटौती, कमतर होती मजदूरी और दैनिक आवश्यकताओं तक कि पूर्ति के लिए बार-बार लिए जाने वाले व्यक्तिगत ऋण का बोझ। मन्दी की मार से बैंक, शेयर बाजार और बड़ी-बड़ी कम्पनियों को बचाने के लिए सरकार हमारे द्वारा दिए गये करों को ही काम में लगाती है और हम इस उम्मीद से देखते रहते हैं कि कब सरकार की यह कॅरपोरेट धनियों को बचाने की नीति का थोड़ा सा लाभ हमारे लिए भी टपकेगा पर ऐसा कभी नहीं होता है। इनके उद्धार की कीमत हम और भी कई प्रकार से चुकाते हैं – नाना प्रकार के सरकारी क्रियाकलाप जो आम आदमी से जुड़े होते हैं उनमें कटौती होती है, सरकारी नियुक्तियों में काट-छाँट हमसे मनवाया जाता है, यहाँ तक कि सामाजिक सुरक्षा और चिकित्सा में भी कटौती की जाती है, अर्थात पूंजीव्यवस्था को अपने खुद के रचे शिकंजे से बचाने की दुहाई देकर घाटे का बजट और राष्ट्रीय ऋण के द्वारा इनके उद्धार का बोझ दूसरों के कन्धों पर डाल दिया जाता है। सवाल यह है कि पूंजी के इस स्वनिर्मित सकंट के हाथों से उसे बचाने के लिए सरकार के इस अन्यायपूर्ण और गलत रवैये का बोझ हम अपने कंधों पर क्यों उठायें, इसलिए आर्थिक परिस्थितियों को बदलने का समय आ गया है।
पूंजीवादी व्यवस्था से निकलने की जो-जो कोशिशें अतीत में होती रही हैं उनसे सबक लेकर हम शुरुआत कर सकते हैं – पारम्परिक समाजतन्त्र जो सोवियत रुस में था – जहाँ उत्पादन के उपादानों पर व्यक्ति नियन्त्रण की जगह सरकारी नियन्त्रण पर जोर दिया गया था और बाजार के बदले सरकारी आर्थिक योजनाओं को प्रमुखता दी गई थी। हालांकि इससे सरकार के हाथों में इतनी क्षमता आ गई थी कि समाजतान्त्रिक लक्ष्य ही भ्रष्टाचार का शिकार हो गया। यद्यपि वर्तमान समय में समाजतन्त्र से पूंजीवाद की तरफ लौटने की प्रक्रिया भी सोवियत पंथी समाजतंत्र की कमियों और असफलताओं में संशोधन या विजय कुछ भी नहीं कर पाया है।
1930 के अमेरिकी पूंजीव्यवस्था के संकट से भी हमने शिक्षा ग्रहण की है। उस समय सीआईओ (कांग्रेस ऑफ इन्डस्ट्रियल अर्गानाईजेशन)2 के द्वारा मजदूर संगठनों के काम में बेहद तेजी आई थी, सभी समाजतान्त्रिक और साम्यवादी पार्टियों के सम्मिलित प्रयासों ने एक ऐसे राजनीतिक समावेश का आकार ग्रहण किया था जिसकी वजह से कई जनमुखी संस्कार शुरु हो सके थे – सामाजिक सुरक्षा और बेकारी बीमा तभी शुरु हुआ था, 110 लाख केन्द्र-सरकारी नौकरियों में नियुक्तियाँ हुई थी। घोर आर्थिक संकट के बीच खड़े होकर ऐसे संस्कारो के लिए अर्थ जुगाड़ा गया था- उच्च आय वाले लोगों पर (जो उस समय बहुत से नियमों से बंधे हुए थे) भारी कर लगा कर। उस समय भी इस ‘न्यू डिल’3 या नई संस्कार नीति को लागू करना आसान नहीं था, ऐसे संस्कारों को तुच्छ नजर से देखा जाता था और 1945 के परवर्ती दशक में तो इसे खत्म ही कर दिया गया। मुनाफा बढ़ाने के लिए बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ और उसके शेयर धारी लगातार कोशिशें करते रहते थे कि ‘न्यू डिल’ या नये संस्कारों में घालमेल करके इस नयी व्यवस्था को नकार दिया जाए। जब तक इन सुधारों से लाभान्वित होने वाले मजदूर स्वयं अपने सुधारों से प्राप्त मुनाफे से इन्हें और अधिक प्रसारित कर पाने की स्थिति में नहीं पहुँचते तब तक जद्दोजहद से प्राप्त किए गये ये जनमुखी सुधार, संकट की स्थिति में ही पड़े रहेंगे और इन्हें बार-बार समाप्त कर देने का षड्यंत्र भी जारी रहेगा।
इसलिए हमारे सामने काम सिर्फ यही नहीं है कि सरकारी और गैर सरकारी में से किसी एक का चुनाव कर लें या बाजार और योजना के बीच से किसी एक को पसंद कर लें बल्कि इसे और प्रसारित करने की आवश्यकता है, और यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि सिर्फ कुछ जनमुखी सुधार करके प्रसन्न हो जाने की भी कोई वजह नहीं है, पूंजीवादी संस्थाएँ आज हो या कल इन सभी सुधारों को नकार सकती हैं और
1‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेटिक’ दो दलों के नाम हैं - संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का चुनावी युद्ध इन्हीं दो दलों के बीच सम्पन्न होता है।
2कांग्रेस ऑफ इंडस्ट्रियल ऑर्गनाइज़ेशन या सिआईओ 1938 में गठित हुआ था, अमेरिका और कनाडा के मजदूर संगठनों को नेतृत्व देने के लिए।
3‘न्यू डिल’ से तात्पर्य है अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलीन रुजवेल्ट के समय में 1933 से 1936 तक के बीच यूस एस कांग्रेस द्वारा अनुमोदित कुछ आर्थिक कार्यक्रम जो उस समय की आर्थिक मंदी से निपटने के लिए बनाये गये थे।
आर्थिक जनतन्त्र – कार्य क्षेत्र और समाज में
जो बदलाव हम लाना चाहते हैं – अपने सामाजिक बदलाव की आशु तालिका में एक नवीन तथा महत्वपूर्ण संयोजन हम करना चाहते हैं – यह बदलाव उत्पादन प्रक्रिया के बाहर नहीं भीतरी स्तर पर होगा, संस्था एवं प्रतिष्ठानों के अंदुरुनी ढ़ाँचे में (घरेलु क्षेत्र, राष्ट्र, विद्यालय आदि) जहाँ से उत्पादन और वितरन होता है, ऐसी सेवाएँ और वस्तुऐं, समाज जिन पर निर्भर करता है - जहाँ कहीं भी उत्पादन की कोई क्रिया घटेगी, मजदूरों को अपने संगठित प्रयास से उसकी बागडोर अपने हाथों में लेनी होगी। इससे सभी के काम का स्वरूप बदल जायेगा, अपनी खुद की ज़िम्मेदारी के अलावा उसे संस्था की उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाने और जारी रखने के उपायों के प्रति भी सक्रिय होना पड़ेगा। ऐसे निर्णय जो एक समय निजी कॅरपोरेट परिचालन समिति या राष्ट्र द्वारा लिए जाते थे कि किस प्रकार कहाँ उत्पादन होगा और विक्रय का लाभ किस प्रकार काम में लाया जायेगा – ये सभी निर्णय अब मजदूरों द्वारा जनतान्त्रिक ढंग से लिये जायेंगे। शिक्षा में भी बदलाव लाकर ऐसे ढंग से पाढ्यक्रम तय किये जायेंगे कि नेतृत्व और नियंत्रण के काम जो अब तक उच्चवर्गीय लोग किया करते थे, उसका प्रशिक्षण सर्वसुलभ हो सके।
उत्पादन व्यवस्था के इस पुनर्विन्यास से राष्ट्र सचमुच आम आदमी के नियंत्रण में आ जायेगा। राष्ट्र की आमदनी (कर इत्यादि) निर्भर करेगी मजदूरों की उत्पादन संस्था की आमदनी से जो हिस्सा मजदूर राष्ट्र को प्रदान करेंगे, उसपर। मुट्ठीभर पूंजीपति जो पूंजी लगाते हैं और राष्ट्र को नियंत्रित करते हैं, उन्हें हटाकर बहुसंख्यक मजदूर ही तब विशिष्ठ स्थान के अधिकारी होंगे।
कार्य क्षेत्र का यह जनतंत्र विभिन्न रिहायशी इलाकों के जनतंत्र से ओतप्रोत जुड़ा होगा और दोनों का एक दूसरे पर उभयमुखी प्रभाव पड़ेगा। आर्थिक एवं राजनीतिक जनतंत्र एक दूसरे के पर्याय हैं और ये एक दूसरे को मजबूत भी करते हैं। स्वनियंत्रित मजदूर और रिहायशी सदस्य एक साथ निर्णय ले सकते हैं और जिम्मेदारी को आपस में बाँट भी सकते हैं। आंचलिक, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर की सभी संस्थाएँ कार्य क्षेत्र और रिहायशी संप्रदाय दोनों को मिलाकर सम्मिलित निर्णय लेने के लिये बाध्य होंगी। अतीत की पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्था से शिक्षा लेकर ये संस्थाएँ काम कर सकतीं हैं।
कार्य क्षेत्र में जनतंत्र से लाभ
जब कार्य क्षेत्र निर्भर संप्रदाय और रिहायशी संप्रदाय मिलकर काम करेंगे और महत्वपूर्ण निर्णय लेंगें तो यह व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था से बिल्कुल अलग होगी, क्योंकि इस व्यवस्था में उत्पादन को अन्यत्र नहीं ले जाया जायेगा जैसा की बहुराष्ट्रीय पूंजीवादी संस्थाए करती हैं। मजदूरों की स्वचालित संस्थाएँ अधिकांश मजदूरों के हितों की उपेक्षा कर कुछ एक उच्च पदाधिकारियों को अधिक वेतन और सुविधाएँ नहीं देंगी। मजदूरों की संस्था, जो अपने निर्णय स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर लेगी, कभी भी कोई टाक्सिक, दूषित, खतरनाक समझौते नहीं करेगी। अधिक मुनाफा कमाने के लिए पूंजीवादी संस्थाए जो हमेशा किया करती हैं, बल्कि यहाँ सम्भावना इस बात की होगी कि ये लोग काम के समय में बच्चों, बुजुर्गों की देखरेख जैसी सेवामूलक परिसेवाओं पर भी ध्यान देंगे। मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार समाज जनतान्त्रिक ढंग से अपने आप को समझने की कोशिश करेगा और अपनी जरूरत के अनुसार समय को बाँट लेगा काम, खेल-कूद, व्यक्तिगत संम्बधों और सांस्कृतिक गतिविधियों आदि को महत्व देते हुए। जो काम हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं या अच्छे लगते हैं उन्हें करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता,ऐसी शिकायतें न करके हम सभी मिलकर तय करेंगे कि काम की समय-सीमा कम की जाये और हमें सचमुच जिन चीजों की आवश्यकता पड़ती है ऐसी उपयोगी वस्तुओं के उत्पादन पर अधिक से अधिक ज़ोर दिया जाए, इससे अपने जीवन को अर्थपूर्ण तरीके से जीने के लिए हम समय बचा सकते हैं। ऐसा होने पर हमलोग सामाजिक भेदभाव, और खींचतान (जातिगत, लैंगिक, वर्गीय या अन्य) से भी मुक्त हो सकेंगे जो पूंजीवाद ही जनता पर आरोपित करती है और जनमानस को बाँट देती है।
अपने कार्य क्षेत्र को जनतान्त्रिक ढंग से पूर्णगठित करके, जहाँ व्यस्क होने के बाद व्यक्ति जीवन का अधिकांश समय व्यतीत करता है, हम एक नये समाज को जन्म दे सकते हैं। अपने अतीत में मानव संप्रदाय ने राजाओं, सम्राटों और शंहनशाहों के शासन को खारिज किया है, और उसकी जगह ली है निर्वाचित प्रतिनिधियों (आंशिक जनतान्त्रिक) ने। समाज के इन बदलावों से जो लोग भयभीत हुए थे और सर्वनाश की भविष्यवाणी कर रहे थे, इतिहास ने उन्हें गलत सिद्ध किया है। आज हम जिस बदलाव की बात कर रहे हैं वह जनतन्त्र को आगे बढाने वाला एक वैज्ञानिक और जरूरी कदम है – जो हमारे कार्य क्षेत्र में आना चाहिए। जो लोग इस बदलाव से भयभीत हो रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि इसका प्रभाव अच्छा नहीं होगा वे आने वाले समय में गलत सिद्ध होंगे, यह निश्चित है।
एक तात्कालिक और वास्तववादी प्रकल्प
आर्थिक जनतंत्र की स्थापना की दिशा में कुछ साधारण लोकप्रिय कदम हम उठा सकते हैं। इस भयंकर, अपव्ययी, निर्मम, बेकारी और दरिद्रता के विरुद्ध हम एक नये प्रकार के सरकारी रोजगार योजना का प्रस्ताव रख सकते हैं। ‘न्यू डील’ या “नये आर्थिक सुधार योजनाओं” का उल्लेख पहले भी किया गया है, यह ‘न्यू डिल’ - केन्द्रीय नियुक्ति प्रकल्प (जब फ्रेंकलीन डी रूज़वेल्ट ने लाखों बेकारों को काम दिया था) से दो अर्थों में भिन्न रहेगा। एक, यहाँ प्राथमिकता दी जायेगी ‘हरित’ और सहायता मूलक सेवाओं पर। ‘हरित’ से हमारा तात्पर्य है कुछ ऐसा जो कार्य क्षेत्र तथा रिहायशी सम्प्रदाय की धारण क्षमता को वृद्धि प्रदान करे जैसे – ऊर्जा की खपत कम करने वाली परिवहन व्यवस्था, जलपथ और जंगलो आदि की उन्नति, कार्य क्षेत्र तैयार करना और प्रदूषण विरोधी ठोस कार्यक्रम तैयार करना। ‘सहायता-मूलक’ सेवा से हमारा तात्पर्य है कार्यदिवस के दौरान बच्चों तथा बड़ों के देखभाल की ऐसी व्यवस्था जो अमेरिकी जीवन पद्धति के अनुकूल हो।
यद्दपि हमारे द्वारा प्रस्तावित किया जाने वाला प्रस्ताव एक नये प्रकार का सरकारी कार्यक्रम है जो अतीत के सभी कार्यक्रमों से भिन्न और बेहतर है। हमारे कार्यक्रम में बेकारों को साप्ताहिक बेकार भत्ता देने के बदले उनकी आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दिया गया है और इसके लिए पर्याप्त सहायता राशि प्रदान करने की बात कही गयी है ताकि वे आत्मनियन्त्रित जनतान्त्रिक संस्था खड़ी कर सकें ।
इस प्रकल्प से कई प्रकार का लाभ मिलेगा, सिर्फ पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से ही यह अपनेआप में अब तक का वृहत्तम पर्यावरण प्रकल्प होगा। एक ऐसे समय में जब लाखों लोग बेकारी की मार झेलते हुए दुबारा आत्मसम्मान से सिर उठा कर अपने परिवार का भरण-पोषण करने लायक उपार्जन कर सकेंगे और उनके क्रय के आधार पर दूसरों को भी रोजगार मिलेगा, अपनेआप में यह कितनी बड़ी घटना होगी। सम्मानजनक मजदूरी पर सरकारी नियुक्तियाँ, हमें लिंग, जाति, भाषा आदि के आधार पर मानव जाति को विभाजित करने वाली शक्तियों के षड़यन्त्र के विरुद्ध भी मजबूत करेगी।
एक विशेष लाभ इससे यह होगा कि अमेरिकी नागरिकों को चुनाव करने के लिए एक नया विकल्प मिलेगा। मनुष्य होने के नाते हम अपने विवेक से परख सकेंगे, एक ऐसी संस्था में काम करने के अनुभव को जहाँ जनतान्त्रिक ढंग से निर्णय लिए जाते हैं। अमेरिकी इतिहास में पहली बार हम अपनी पसंद से चुनाव करने की स्थिति में होंगे कि हम कैसी संस्था में काम करेंगे - ऊपर से नीचे तक नौकरशाही से बंधी पूंजीवादी व्यवस्था में या परस्पर सहयोग निर्भर सहकारी जनतान्त्रिक संस्था में। हमारे समाज का भविष्य निर्भर करेगा कि अमेरिकी नागरिक किसे पसंद करते हैं, और इसी प्रकार एक जनतान्त्रिक समाज का भविष्य निर्मित होना चाहिए।
इस प्रकल्प को धारण करने वाली गहरी जड़ें
अमेरिकी नागरिक हमेशा से विभिन्न प्रकार के सहयोगिता मूलक संस्थाओ को निर्मित करने मे रुचि लेते रहे हैं - जो ज़्यादातर पूंजीवादी ढ़ाँचे से प्रभावित रही हैं - हमारा इतिहास इसका साक्षी है। एक सहयोगिता मूलक राष्ट्रसंघ या 'कोअपरेटिभ कामनवेल्थ'1 से जुड़ने की इच्छा लोगों में बराबर रही है। आज करीब 137 लाख अमेरिकी नागरिक 11,400 ईएसओपी2 संस्थाओं में काम करते हैं जहाँ संस्थाओ के आंशिक मालिक उसके कर्मचारी ही हैं। तथाकथित 'मुनाफे के लिए नहीं' ऐसी संस्थाएँ विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में पूरे अमेरिका भर में फैली हुई हैं। कुछ वैकल्पिक गैर पूंजीवादी संस्थाए मॅनड्रागॅन3 के उदाहरण से प्रभावित हुई थीं, जो 250 जनतान्त्रिक रूप से निर्वाचित मजदूर सहकारी सम्मिलित संस्था है, जिसमें स्पेन के वास्क अंचल के प्राय: एक लाख मजदूर काम करते हैं चुंकि इन मजदूरों की मजदूरी, मजदूर-मालिकों द्वारा तय की जाती है इसलिए इस संस्था में जो लोग निर्णय लेने के अधिकारी होते हैं उनके साथ दूसरों की मजदूरी का आनुपातिक अंतर होता है 5:1 का, जबकि वर्तमान पूंजीवादी बहुराष्ट्रीय संस्थाओं में यह अनुपात है 475:1 का है।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का सहकारी आंदोलन आज बहुत विस्तृत है – आरिजमेन्डी एसोशियेसन (सन-फ्रांसिस्को) से भिदा-भेरदे क्लिनिंग कोअपरेटिभ (मैसाचुसेट्स) से ब्लैक स्टार कलेक्टिभ पब एण्ड ब्रेवरी (ऑस्टीन,टैक्सेस) चन्द गिने-चुने नाम हैं। मजदूरों द्वारा परिचालित अमेरिका की सबसे बड़ी सहकारी संस्था है 'ऐभरग्रीन कोओपरेटिभ मॉडल’ (या क्लीभलैंड मॉडल) उदाहरण स्वरूप जिसके सदस्य हैं – ऐभरग्रीन कोओपरेटिभ लॉन्ड्री (ईसीएल) ओहायो कोओपरेटिभ सोलर (ओसीएस) एवं ग्रीन सिटी ग्रोआर्स । इन सभी सहकारी संस्थाओं में कुछ विशेषताएँ समान्य हैं – (क) कार्य क्षेत्र में जनसाधारण का मालिकाना हक (ख) परिवेश सचेतनता के साथ अस्तित्व से जुड़े सामान तथा सेवाएँ प्रदान करना और ग्रीन जाब पैदा करना (ग) नये प्रकार की संप्रदाय गत आर्थिक योजनाएँ जो लोगों तक 'ऐंकर इंस्टिटियुशन'4 के माध्यम से ले जाया जायेगा (विश्वविद्यालय, सेवामूलक अस्पताल, इत्यादि), विभिन्न संप्रदायों के प्रतिष्ठान, विकास-योजना कोष, राष्ट्रीय बैंक या कर्मचारी सहकारी बैंक आदि। ऐसी सरकारी संस्थाएँ आर्थिक विकास की नई अवधारणा को जन्म दे रही हैं।
ये सभी उदाहरण विभिन्न प्रकार और मात्राओं में कार्य क्षेत्र में जनतंत्र की उपस्थिति को प्रमाणित करते हुए गैरपूंजी निर्भर कार्यों के प्रति सामाजिक रुचि और दायबद्धता को सिद्ध करते हैं। अनेकों प्रचलित परिकथाओं के विपरीत आज एक मजबूत लोकप्रिय आधार तैयार है जिस पर उत्पादन संगठन के एक व्यापक आंदोलन की नींव रखी जा सकती है। कार्य क्षेत्र में जनतंत्र गहरी इच्छा और जरूरत को महसूस करने पर ही लागू किया जा सकता है।
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डेविड मैन आर्सडेल माईकल मैकाकेब कोस्टास पैनायोटाकिस
जॉन रहमान सोहनिया साईरस
विलि होयार्टन रिचर्ड डी वुल्फ
1राष्ट्रों की पारस्परिक सहयोगिता पर आधारित राष्ट्रसंघ कि यह धारणा बहुत पुरानी है। कनाडा में इस नाम का एक दल भी है।
2'ईएसओपी' से तात्पर्य है ऐसी संस्था जो अपने कर्मचारियों को उनके आय के हिस्से के अनुपात से संस्था के शेयरों का मालिक होने का अवसर देती है।
3'मॅनड्रागॅन' स्पेन के बास्क अंचल के मॅनड्रागॅन शहर मे मजदूर संघ निर्भर एक व्यवसायिक संस्था है।
4'ऐंकर इंस्टिटियुशन' की धारणा हमारे लिए अपरिचित है, इसका अनुवाद नहीं करके मूल शब्द को ही रखा गया है। 'ऐंकर' प्रतिष्ठान ऐसी संस्थाए हैं जो किसी मुनाफे के लिए काम नहीं करतीं, एकबार जहाँ ये संस्थाएँ बनतीं हैं, वहीं रहतीं हैं, स्थान परिवर्तन नहीं करतीं।
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